Interesting new version of "गधे का भार" भाग 2 panchtantra story


  एक समय की बात हैं।एक गांव में एक व्यापारी रहता था।उसके पास एक गधा और घोडा था।दोनों जानवर अब आपस में बहुत समझ कर रहते थे।वह आपस में बाट कर व्यापारी का सारा काम कर लेते थे।व्यापारी भी उनकी दोस्ती से खुश रहने लगा।
   व्यापारी के पड़ोस में एक धोबी रहता था।उसके पास भी एक गधा था। दोनों गधे आपस में बहुत अच्छे मित्र थे। एक बार धोबी के गधे ने व्यापारी के गधे से कहा,"मित्र भले सारी दुनिया हमें मुर्ख कहती हैं लेकिन हमारी बिरादरी में तुम थोड़े होशियार निकले। तुम तो एक घोड़े से थोड़ा बहुत अपना काम करवा लेते हो"।
    यह सुनकर व्यापारी के गधे को अपने आप पर फक्र मेहसूस हुआ।उसने धोबी के गधे से कहा कि "तुम देखना मैं थोड़ा बहुत नहीं अपना सारा काम भी घोड़े से करवा सकता हूँ"। धोबी के गधे ने कहा ऐसी बात हैं तो चलो तुम्हारी समझदारी देख ही लेते हैं।
     दूसरे दिन जब व्यापारी ने गधे और घोड़े पर अपना सामान रखा तो गधा बेहोस हो कर गिर गया।यह देखकर व्यापारी ने सारा सामान घोड़े की पीठ पर रखकर घोड़े को लेकर बाज़ार की ओर निकल पड़ा।इधर व्यापारी के जाते ही गधा उठ खड़ा हुआ और आराम से सारा दिन निकाला।जब शाम को घोड़ा लोटा तो उसने गधे से उसका हाल पुछा तो उसने कहा कि उसकी तबीयत ठीक नहीं हैं।अब यह हर रोज़ का क्रम बन गया। जैसे ही व्यापारी गधे की पीठ पर सामान रखता वह बेहोस होने का नाटक करने लगता।गधे के दिन अब आराम से गुजरने लगे और अब उसे अपनी होशियारी पर गर्व महसूस होने लगा। दूसरी तरफ व्यापारी को लगा की गधा अब उसके कोई काम का नहीं रहा बस मुफ्त का खाना खाता रहता हैं ।व्यापारी ने गधे को अपने घर से निकाल दिया।गधा अब अपनी गलती पर पस्ताने लगा।


शिक्षा:हमें दूसरों की अच्छाई का फायदा नहीं उठाना चाहिए।

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